140 करोड़ का देश और FIFA रैंकिंग 139! क्या क्रिकेट के अंधे जूनून ने मार डाला भारतीय फुटबॉल?


जब 20 तारीख को  स्पेन ने फीफा वर्ल्ड कप की चमचमाती ट्रॉफी अपने नाम की / हवा में लहराई, तो पूरी दुनिया जश्न मना रही थी। लेकिन एक हिंदुस्तानी होने के नाते मेरे सीने में एक अजीब सा दर्द उठा। टीवी स्क्रीन को देखते हुए दिल से एक ही आवाज आ रही थी—आखिर कब तक? 140 करोड़ की आबादी वाला हमारा भारत देश, आज फीफा की रैंकिंग में 139वें स्थान पर सड़ रहा है।  

ज़रा सोच कर देखिए, जैसे आज स्पेन ने वर्ल्ड कप जीता, वैसे ही अगर आज हमारी इंडिया टीम फीफा वर्ल्ड कप जीती होती, तो हमें कितनी बेहिसाब खुशी होती जब टीम इंडिया क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतती है, तो हम सब खुशी से पागल हो जाते हैं, सड़कों पर उतरकर दीवाली मनाने लगते हैं  लेकिन अगर आज भारत फुटबॉल का किंग बनकर फीफा वर्ल्ड कप उठाता, तो यकीन मानिए, देश को वो क्रिकेट वाली खुशी तो मिलती ही, पर पूरी दुनिया के सबसे बड़े खेल का बादशाह बनने की वो खुशी  डबल खुशी'  होती! पूरे देश में ऐसा भूचाल आता जो आज तक किसी ने नहीं देखा होगा। लेकिन सच तो यह है कि हम अभी इस मुकाम से बहुत पीछे हैं।"

क्या हमारे बच्चों में टैलेंट की कमी है? नहीं! असलियत तो यह है कि आज भारत की हर दूसरी गली में आपको एक बैट पकड़े हुए क्रिकेटर मिल जाएगा। हमारे बच्चों की रगों में, उनके खून-खून में फुटबॉल से ज़्यादा क्रिकेट का जूनून दौड़ रहा है। आज का बच्चा पैदा बाद में होता है, उसके हाथ में प्लास्टिक का बल्ला पहले थमा दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि बच्चों को फुटबॉल में इंटरेस्ट नहीं है, लेकिन क्रिकेट के इस दीवानेपन के आगे फुटबॉल का वो क्रेज घुटने टेक देता है। हमने खुद अपने हाथों से बच्चों के अंदर के फुटबॉलर को मारकर वहां एक क्रिकेटर पैदा कर दिया है।

मैं क्रिकेट का दुश्मन नहीं हूँ, पर यह अंधा कानून क्यों?

यहाँ मैं एक बात बिल्कुल साफ कर दूँ—मैं क्रिकेट से नफरत नहीं करता, और न ही मैं यह चाहता हूँ कि आप क्रिकेट देखना छोड़ दें। क्रिकेट हमारा गौरव है, हमारी शान है। लेकिन मेरा दर्द यह है कि हम क्रिकेट को एक 'अंधे कानून' की तरह फॉलो कर रहे हैं। हम इस कदर अंधे हो चुके हैं कि हमें क्रिकेट के अलावा कुछ और दिखाई ही नहीं देता।

मैं बस इतना चाहता हूँ कि खेल को खेल के नजरिए से देखा जाए। हमें क्रिकेट को जितना सपोर्ट करना है, ज़रूर करें, लेकिन साथ ही हर दूसरे खेल को भी उतना ही प्यार दें। सोचिए, आज जैसे हम क्रिकेट में नंबर वन बनकर सीना तानकर बैठे हैं, काश वैसा ही सपोर्ट हम बाकी खेलों को भी देते! आज हमारा भारत फुटबॉल में भी नंबर वन होता, कबड्डी और हॉकी में भी हमारा डंका बज रहा होता, फाइटिंग (बॉक्सिंग/रेसलिंग) में हमारे खिलाड़ी दुनिया को धूल चटा रहे होते और ओलंपिक की मेडल टैली में अमेरिका-चीन को पछाड़कर हम टॉप पर होते! लेकिन अगर हम सिर्फ इसी तरह क्रिकेट के अंधे कानून के चक्कर में पड़े रहे, तो फुटबॉल या कोई भी दूसरा खेल इस देश में कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा।

क्रिकेट का इतिहास: यह खेल भारत का 'भगवान' बना कैसे?"

चलो थोड़ा पीछे चलते हैं और देखते हैं कि इन दोनों खेलों की कहानी शुरू कहाँ से हुई। अगर क्रिकेट की बात करें, तो इसकी शुरुआत सदियों पहले इंग्लैंड के चरवाहों ने की थी। वो लोग टाइमपास करने के लिए भेड़ की ऊन से बनी गेंद और डंडे से इसे खेलते थे। फिर जब अंग्रेज हमारे देश में आए, तो साल 1721 के आसपास गुजरात के समुद्र किनारे उन्होंने पहली बार यह गेम खेला। वहाँ से हमारे देश के लोगों को भी इसका चस्का लग गया। भारतीयों में सबसे पहले पारसी समुदाय ने इसे अपनाया और धीरे-धीरे यह अंग्रेजों से हमारे देश में ट्रांसफर हो गया। शुरुआत में यह सिर्फ एक खेल था, लेकिन 1983 के वर्ल्ड कप के बाद कॉर्पोरेट कंपनियों और टीवी चैनलों ने इसे 'पैसा छापने की मशीन' बना दिया और बाकी सारे खेलों को वेंटिलेटर पर धकेल दिया।

फुटबॉल की कहानी: इसकी शुरुआत कहाँ से हुई?"

अब जरा फुटबॉल पर आते हैं, जो पूरी दुनिया का सबसे चहेता और सबसे पुराना खेल है। आज हम जो फुटबॉल देखते हैं, उसे चमकाने का काम भी अंग्रेजों ने 19वीं सदी में किया था, हालांकि इसका पुराना रूप चीन और रोम में बहुत पहले से खेला जा रहा था। भारत में भी फुटबॉल अंग्रेज ही लेकर आए थे। फिर साल 1889 में हमारे यहाँ 'मोहन बागान' क्लब बना, जो एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल क्लबों में से एक है।

एक समय था, यानी 1948 से 1960 के बीच, जब भारतीय फुटबॉल टीम को 'एशिया का ब्राजील' कहा जाता था। हमने एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीते और ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे। तब हमारे पास फुटबॉल की समृद्ध विरासत थी, लेकिन फिर क्या हुआ? हमने फुटबॉल को भुला दिया और क्रिकेट की चकाचौंध में खो गए।

कड़वा सच: क्रिकेट ने 'खाली' बाकी सारे खेलों की जगह

आज भारत में जितना पैसा, जितनी स्पॉन्सरशिप और जितनी इज्जत अकेले क्रिकेट को मिलती है, उसका सिर्फ 10% हिस्सा भी अगर दूसरे खेलों को मिलता, तो आज हमारे खिलाड़ी विदेशों में जाकर तहलका मचा रहे होते। जब आईपीएल (IPL) आता है, तो करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, लेकिन जब हमारे फुटबॉल खिलाड़ी देश के लिए खून-पसीना बहाते हैं, तो उन्हें ढंग का मैदान और डाइट तक नसीब नहीं होती।

देश के लिए 90 से ज्यादा इंटरनेशनल गोल करने वाले महान सुनील छेत्री को जब हाथ जोड़कर फैंस से स्टेडियम आने की भीख मांगनी पड़ी थी, वह दिन भारतीय खेल इतिहास का सबसे शर्मनाक दिन था। हमारी इंसानियत कहाँ सो गई थी तब? हम रात-रात भर जागकर मेसी और रोनाल्डो के लिए चिल्ला सकते हैं, लेकिन अपनी देश की जर्सी पहनने वाले खिलाड़ियों के लिए हमारे पास वक्त नहीं है।

अगर आज क्रिकेट का यह अंधा जुनून न होता, तो स्पेन की जगह होता भारत!

सोचिए, अगर आज भारत में क्रिकेट का यह एकतरफा राज न होता , तो क्या होता? अगर हमने वही प्यार, वही पैसा और गली-गली में दौड़ने वाला वही पागलपन फुटबॉल को दिया होता, तो आज न केवल हमारी टीम फीफा वर्ल्ड कप खेल रही होती, बल्कि स्पेन और अर्जेंटीना की तरह हम भी वर्ल्ड कप की ट्रॉफी जीतकर इतिहास रच रहे होते।

जब तक हम क्रिकेट के इस चश्मे को उतारकर फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी और एथलेटिक्स जैसे खेलों को बराबर का हक, पैसा और सम्मान नहीं देंगे, तब तक भारत खेलों की दुनिया में एक 'एकतरफा' देश ही बना रहेगा।

अब फैसला आपके हाथ में है—क्या आप सिर्फ एक खेल के अंधे भक्त बने रहना चाहते हैं, या भारत को हर खेल में दुनिया का असली 'सुपरपावर' देखना चाहते हैं? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं और इस को हर उस खेल प्रेमी तक पहुंचाएं जिसकी आंखें खोलना जरूरी है!

                         ... लेखक नेम शानू धोनी सर फैन बॉय... 

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