​धर्म और वसूलों के आगे करोड़ों की स्पॉन्सरशिप भी पड़ी फीकी भारत के खिलाफ टी20 सीरीज़ में जिम्बाब्वे के कप्तान सिकंदर रज़ा ने जर्सी पर सट्टेबाजी ऐप का लोगो पहनने से किया साफ इनकार



भारत और ज़िम्बाब्वे के बीच खेली गई 3 मैचों की टी20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज़ भले ही मैदान पर खत्म हो चुकी है, लेकिन क्रिकेट के गलियारों में एक ऐसी बात को लेकर गहरी चर्चा शुरू हो गई है जिसने हर खेल प्रेमी का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। अक्सर क्रिकेट के मैदान पर हार-जीत, रिकॉर्ड और चौके-छक्कों की बातें तो हर कोई करता है, लेकिन इस सीरीज़ के दौरान एक खिलाड़ी ने खेल भावना और इंसानी वसूलों की जो मिसाल पेश की है, वह विरले ही देखने को मिलती है।

​अगर आपने इस पूरी सीरीज़ के दौरान मैचों को बहुत बारीकी से देखा हो, तो एक बात साफ तौर पर नजर आ रही थी। ज़िम्बाब्वे के सभी खिलाड़ियों की जर्सी पर एक प्रमुख सट्टेबाजी (Betting) ऐप का स्पॉन्सर लोगो छपा हुआ था। लेकिन पूरी टीम में सिर्फ एक खिलाड़ी ऐसा था, जिसकी जर्सी पर वह विज्ञापन दूर-दूर तक मौजूद नहीं था। वो खिलाड़ी कोई और नहीं, बल्कि ज़िम्बाब्वे टीम के कप्तान और दुनिया के बेहतरीन ऑलराउंडर सिकंदर रज़ा हैं।

​पैसों की चमक के आगे नहीं झुके सिकंदर रज़ा

​सिकंदर रज़ा ने ज़िम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड के सामने सीरीज़ शुरू होने से पहले ही यह कड़ा स्टैंड ले लिया था कि वह मैदान पर टीम की अगुवाई तो पूरी शिद्दत से करेंगे, लेकिन अपनी जर्सी पर किसी भी सट्टेबाजी या जुए को बढ़ावा देने वाले ब्रांड का लोगो कतई नहीं लगाएंगे। कप्तान के इस फैसले के बाद क्रिकेट जगत में उनकी ईमानदारी की दाद दी जा रही है।

​अब सवाल यह उठता है कि आज के दौर में जहाँ खेल पूरी तरह से पैसों का बिजनेस बन चुका है, वहाँ रज़ा ने करोड़ों रुपये की इस स्पॉन्सरशिप को लात क्यों मार दी? दरअसल, इसके पीछे की वजह उनके अपने नैतिक मूल्य और धार्मिक सिद्धांत हैं। सिकंदर रज़ा एक पक्के मुस्लिम हैं और इस्लाम धर्म के नियमों के मुताबिक जुआ, सट्टा, सट्टेबाजी या किसी भी प्रकार के नशे को 'हराम' यानी पूरी तरह से वर्जित माना गया है। रज़ा अपने सिद्धांतों को लेकर इतने अडिग हैं कि उन्होंने पैसों की चमक के आगे घुटने टेकने से साफ मना कर दिया। उनका मानना है कि वह चंद रुपयों के लालच में किसी ऐसी चीज़ का चेहरा नहीं बन सकते जो समाज में युवाओं को गलत लत की तरफ धकेलती हो।

​इन दिग्गज खिलाड़ियों की कतार में हुए शामिल

​क्रिकेट के इतिहास पर नज़र डालें तो यह पहली बार नहीं है जब किसी खिलाड़ी ने अपने वसूलों के लिए करोड़ों का नुकसान सहा हो। सिकंदर रज़ा से पहले साउथ अफ्रीका के दिग्गज बल्लेबाज हाशिम अमला ने अपने पूरे करियर में कभी भी शराब ब्रांड की स्पॉन्सरशिप वाली जर्सी नहीं पहनी, भले ही इसके लिए उन्हें हर महीने अपनी मैच फीस का एक बड़ा हिस्सा जुर्माने के तौर पर बोर्ड को चुकाना पड़ता था। ठीक इसी तरह इंग्लैंड के मोईन अली, आदिल राशिद और अफगानिस्तान के राशिद खान भी हमेशा सट्टेबाजी और अल्कोहल के विज्ञापनों से दूरी बनाकर रखते हैं। अब सिकंदर रज़ा ने भी इसी महान लिस्ट में अपना नाम दर्ज करा लिया है।

​क्रिकेट फैंस और खेल पंडित आज रज़ा के इस कदम की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। आज के इस दौर में जहाँ बड़े-बड़े दिग्गज खिलाड़ी सिर्फ पैसों के लिए पान मसाला, रम्मी और सट्टेबाजी वाले विज्ञापनों में धड़ल्ले से नजर आते हैं, वहीं ज़िम्बाब्वे के इस कप्तान ने यह साबित कर दिया कि दुनिया में हर चीज़ बिकाऊ नहीं होती और कुछ चीजें पैसों से कहीं ऊपर होती हैं।

मैदान पर तो सिकंदर रज़ा अपनी कप्तानी और ऑलराउंड खेल से मैच का पासा पलटते ही हैं, लेकिन मैदान के बाहर उनके इस फैसले ने उन्हें एक असली हीरो बना दिया है। सच तो यह है कि जब चारों तरफ पैसों का बोलबाला हो, ऐसे में अपने वसूलों पर टिके रहना हर किसी के बस की बात नहीं होती। रज़ा का यह कदम वाकई काबिले-तारीफ है। 

आपको क्या लगता है, क्या बाकी देशों के स्टार खिलाड़ियों को भी सिकंदर रज़ा से सीख लेकर सट्टेबाजी वाले ऐप्स का प्रचार बंद कर देना चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। प्लीज अगर पोस्ट अच्छी लगी हो, तो दोस्तों के साथ शेयर करें

                        ... लेखक नेम शानू धोनी सर फैन बॉय... 


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