ICC और BCCI के पास अरबों का बजट फिर भी Cricket Stadiums में Roof क्यों नहीं जानिए सच
| ICC और BCCI के पास अरबों का बजट फिर भी Cricket Stadiums में Roof क्यों नहीं जानिए सच |
फिर हम सब स्क्रीन के सामने खड़े-खड़े वही पुराना तमाशा देखते हैं। ग्राउंड स्टाफ के वो प्यारे साथी भारी-भरकम प्लास्टिक कवर्स लेकर मैदान में पागलों की तरह दौड़ रहे होते हैं। उस पल दिमाग में बस एक ही ख्याल आता है इतने बड़े क्रिकेट मैच में यह तिरपाल वाला पुराना जुगाड़ कब तक चलेगा
कल्पना कीजिए एक ऐसे फ्यूचरिस्टिक स्टेडियम की
ज़रा सोचिए, बारिश की एक बूंद गिरते ही स्टेडियम के ऊपर से चार विशालकाय रोबोटिक विंग्स (Wings) बाहर आते हैं। सिर्फ 5 मिनट में पूरा मैदान ऊपर से एक पारदर्शी शीशे या फैब्रिक की छत से ढका जाता है। बाहर मूसलाधार बारिश होती रहे, लेकिन अंदर स्टेडियम में फ्लडलाइट्स की जगमगाहट के बीच बिना एक सेकंड रुके मैच चलता रहे
सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म या किसी जादुई दुनिया जैसा लगता है ना? लेकिन सबसे मजे की बात यह है कि यह तकनीक सिर्फ कोई कोरा सपना नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न (Marvel Stadium) और विंबलडन जैसे मैदानों पर ऐसी ऑटोमैटिक छतें आज भी काम कर रही हैं।
तो फिर क्या वजह है कि हर फैंस के इस पसंदीदा आइडिया को दुनिया भर के बड़े क्रिकेट स्टेडियम्स में हर जगह लागू नहीं किया जा पा रहा? चलिए इस रोमांचक पहेली के पीछे के कुछ दिलचस्प पहलुओं को समझते हैं।
विशाल आकार का इंजीनियरिंग चैलेंज
क्रिकेट का मैदान किसी भी अन्य खेल के कोर्ट से बहुत बड़ा होता है। इतने बड़े हिस्से पर बिना किसी बीच के खंभे (Pillar) के ऊपर झूलती हुई छत बनाना सिविल इंजीनियरिंग का एक अद्भुत चमत्कार है। इसे बनाने और सही से चलाने के लिए बहुत ही भारी-भरकम रोबोटिक्स और भारी मैकेनिक्स की जरूरत होती है।
क्रिकेट का कुदरती मिजाज और पिच
क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि मौसम के साथ चलने वाली एक कला है। खुली धूप, ताजी हवा और हवा की नमी (Humidity) गेंद के स्विंग और पिच के बर्ताव को तय करती है। जब किसी मैदान को पूरी तरह पैक कर दिया जाता है, तो अंदर का माहौल किसी बंद कमरे (Indoor Stadium) जैसा हो जाता है। ऐसे में गेंदबाजों को मिलने वाली कुदरती मदद और क्रिकेट का वो पुराना रोमांच बदल जाता है।
असली हरी घास की देखभाल
ग्राउंड की पिच और आउटफील्ड पर उगी असली कुदरती घास को जिंदा और हरा-भरा रखने के लिए भरपूर धूप की जरूरत होती है। अगर ऊपर एक परमानेंट छत का ढांचा बना रहेगा, तो धूप रुकने से मैदान की घास की क्वालिटी बनाए रखना एक बड़ा काम बन जाता है।
बजट और इस्तेमाल
ICC और BCCI जैसे बड़े क्रिकेट बोर्ड्स के लिए बजट की कोई कमी नहीं है। लेकिन ऐसी स्वचलित छत बनाने की लागत हज़ारों करोड़ रुपये में आती है। क्रिकेट अधिकारी अक्सर यह सोचते हैं कि पूरे साल में सिर्फ 2 या 3 बारिश वाले मैचों को बचाने के लिए इतना भारी निवेश किया जाए, या फिर वही पैसा 'नेक्स्ट-जनरेशन ड्रेनेज सिस्टम' जैसी नई वैक्यूम तकनीकों पर लगाया जाए जो बारिश रुकते ही 15 मिनट में मैदान सुखा देती हैं।
रोबोटिक छत वाला स्टेडियम हर क्रिकेट फैन का एक बहुत प्यारा सपना है और तकनीक के मामले में यह बिल्कुल संभव है! भले ही अभी क्रिकेट बोर्ड्स छत की जगह आधुनिक ड्रेनेज तकनीक को तवज्जो दे रहे हों, लेकिन जिस तेजी से टेक्नोलॉजी आगे बढ़ रही है, वो दिन दूर नहीं जब हमें भारत में भी पहला फुल्ली-कवर्ड ऑल-वेदर क्रिकेट स्टेडियम मैच की मेजबानी करता दिखेगा
तो दोस्तों आपका क्या सोचना है इस पूरे पंगे पर क्या इंडिया में जी हाँ, अपने भारत के हर बड़े क्रिकेट स्टेडियम में ऐसा ग्राउंड बनना चाहिए जहाँ बारिश आते ही रिमोट दबाया और 5 मिनट में पूरी छत बंद फिर जैसे ही धूप निकले रिमोट दबाया और ग्राउंड वापस ओपन
आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या आपको लगता है कि BCCI को अब तिरपाल छोड़ इस हाई-टेक छत पर काम शुरू कर देना चाहिए? अपनी कीमती राय नीचे कमेंट सेक्शन में ज़रूर शेयर करें
और हाँ, इस दिलचस्प अपडेट को अपने उन सभी क्रिकेट-लवर दोस्तों के साथ शेयर करना बिल्कुल न भूलें, जो बारिश आते ही टीवी पर सिर पकड़ कर बैठ जाते हैं! उन्हें भी तो पता चलना चाहिए कि भारत में ऐसा ड्रीम स्टेडियम बनना मुमकिन है या नहीं।
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... लेखक नेम शानू धोनी सर फैन बॉय...
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